Adivasi Samaj Information in Hindi

Adivasi

Adivasi भारत में रहनेवाली एक जनजाती है। जिन्हे भारत के मूल निवासी भी माना जाता है। ये एक संस्कृत शब्द है जिसे 1930 के दशक में किसी आदिवासी राजनितिक कार्यकर्ता द्वारा स्वदेशी होने का दावा करके आदिवासियों  को एक स्वदेशी पहचान देने के लिए सबसे पहले इस्तेमाल किया गया था।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में तक़रीबन 104.2 मिलियन यानी 10 करोड़ 42 लाख आदिवासी लोग रहते हैं। जिनमे प्रमुख तौरपे तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छतीसगढ़, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिसा आदी राज्य में अधिकतर मात्रा हैं। 

आदिवासी शब्द का मतलब और इस्तेमाल

आदिवासी ये एक भारतीय जनजाती को निर्देशित किया जाने वाला शब्द है। जो भारत के मूल निवासी होने की बात की जाती है। द्रविड़ और इंडो-आर्यन के पहले इसे "भारतीय उप महाद्वीप मूल निवासी माने जाने वाले विभिन्न जातीय समूहों में से किसी एक" को समझा जाता था। 

हालांकि भारत ने अभी तक जनजातीय लोगों को मूल निवासी के रूप में मान्यता नहीं दी है। 

दरअसल Adivasi शब्द आधुनिक संस्कृत से लिया गया है। इसका इस्तेमाल पहली बार 1930  दशक में जनजातीय राजनितिक कार्यकर्ता ने जनजातीय लोगो को मूल निवासी की पहचान देने के लिए किया था। उस वक्त इंडो-यूरोपियन और द्रविड़ियन भाषा बोलने वाले लोग मूल निवासी नहीं हैं ये आरोप भी किया गया था। 

सरल भाषा में देखा जाए तो आदिवासी का मतलब है "आदि" यानी की "सुरुवाती, मूल" और "वासी" यानी "निवासी" तो इसीलिए इसका मतलब होता है "मूल निवासी".

हालांकि भारत में आटविका, वनवासी या गिरिजन शब्दों का इस्तेमाल भी भारतीय जनजाती के लिए किया जाता है। 

भारत के संविधान ने इन समूहों को "सामाजिक और आर्थिक विकास" के लक्ष्य के लिए एक साथ रखा है।  उस समय से भारतीय आदिवासी को आधिकारिक तौर पे अनुसूचित जनजाती के नाम से जाना जाता है। 

आदिवसीयोंका विस्तार

भारत में अनुसूचित जनजातीय लोगोंकी एक बड़ी सूची को भारत के संविधान के तहत आदिवासी के रूप में मान्यता दी गई है। 

अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड आदि पूर्वोत्तर राज्यों में 90 % से ज्यादा की आबादी आदिवासियों की है। वहीं  आसाम, मणिपुर, सिक्किम, और त्रिपुरा में आदिवासी लोगों  की आबादी 20 से 30 % ही है। 

आदिवासियों की सबसे बड़ी आबादी पूर्वी गुजरात और पश्चिम में राजस्थान से लेकर पश्चिमी बंगाल तक फैली एक बेल्ट में रहती है, जिसे आदिवासी बेल्ट के रूप में भी जाना जाता है। 

ये जनजातियाँ मुख्य तौर पर तीन क्षेत्र में रहती है।  पश्चिमी क्षेत्र में पूर्वी गुजरात, दक्षिण-पूर्वी राजस्थान और  उत्तर-पश्चिमी महाराष्ट्र के साथ साथ पश्चिमी मध्य प्रदेश में भील जैसी जनजातियों का वर्चस्व है। 

पूर्वी महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश, पश्चिमी और दक्षिणी छत्तीसगढ़, उत्तरी और पूर्वी तेलंगाना, उत्तरी आंध्र प्रदेश और पश्चिमी ओडिशा को कवर करनेवाले मध्य क्षेत्र में गोंड और खोंड आदि जनजातियों का वर्चस्व है। 

झारखण्ड में छोटा नागपुर पठार और छत्तीसगढ़, ओडिसा और पश्चिम बंगाल के आस-पास के इलाके में केंद्रीय पूर्वी बेल्ट है जहाँ मुंडा जनजातियों का वर्चस्व है। 

आदिवसीयोंका इतिहास

आदिवासी भारत के मूल निवासी होने का दावा किया जाता है। अभी जो आदिवासी हैं उनमे से कई आदिवासी समुदाय सिंधु घाटी सभ्यता के विनाश के बाद बने।

प्राचीन और मध्यकाल में आदिवासी

इस समय में आदिवसीयोंको दलितों से विपरीत आतंरिक रूप से अशुद्ध नहीं माना जाता था, हालांकि असभ्य और आदिम मन जाता है। आदिवासी मूल के वाल्मीकि जिन्होंने रामायण की रचना की थी और जिसका स्वीकार किया गया। 

दलितों में दिखने वाली अधीनता के विपरीत आदिवासी अक्सर स्वायत्तता का आनंद लेते थे और क्षेत्र के आधार पर मिश्रित शिकारी समूह और कृषि व्यवस्था निर्माण किया करते थे। 

कुछ बड़े आदिवासी समूह मध्य भारत में अपने राज्यों को बनाकर सुरक्षित रखने में सक्षम थे सायद इसी वजह से कुछ क्षेत्रों में स्थानिक शासकों द्वारा आदिवसीयोंका समर्थन हासिल करना महत्वपूर्ण माना जाता था। 

आदिवासी राज्य गढ़ा-मंडला और चंदा के राजा मीणा और गोंड इसी के उदहारण है जो इस क्षेत्र में शासन करते थे, और न सिर्फ अपने गोंड विषयों के वंशानुगत नेता थे बल्कि गैर-आदिवासियों  पर्याप्त समुदायों पर भी हावी थे। 

आदिवासियों और दूसरे भारतीय समाज के बीच जो संबंध थे उसके बारे में इतिहास लेखन उतना अच्छा नहीं है। ब्रम्हपुत्रा घाटी के राजा और पहाड़ी नागाओं के बिच हुए गठजोड़ का उल्लेख मिलता है। 

16 वी शताब्दी की शुरुआत में आदिवासियों द्वारा आदिवासी भूमि की सापेक्ष स्वायत्तता और सामूहिक स्वामित्व मुगलों के आगमन से गंभीर रूप से बाधित हो गया था। 1632 में भील विद्रोह और 1643 में भील-गोंड विद्रोह ये दोनों मुग़ल सत्ता के खिलाफ किये गए थे जिन्हे मुग़ल सैनिकों द्वारा शांत किया गया था। 

मीणाओं के क्षेत्र में कछवाहा राजपूतों और मुगलों की आगमन से उन्हें धीरे धीरे जंगलों में गहरे धकेल दिया गया। इसका नतीजा ये हुआ की ऐतिहासिक साहित्य ने मीना जनजाति  तरह से दरकिनार कर दिया। 

आदिवासी राजा बड़ा मीना पर मुगलों और भारमल की संयुक्त सेना ने हमला किया जिसमे राजा बड़ा मीणा को मार डाला गया। उसके बाद बड़ा का खजाना मुगल और भारमल ने आपस में बाँट लिया  था। 

ब्रिटिश काल (1857 से 1947 तक)

ब्रिटिश शासन के समय में औपनिवेशक प्रशासन ने आदिवासी व्यवस्था पर अतिक्रमण किया जिसकी वजह से आदिवासी अंग्रेजो के खिलाफ काफी आक्रामक थे। आदिवसीयोंने हमेशा ही विद्रोह का समर्थन किया है या फिर खुद विद्रोह किया। 

18 वी शताब्दी के शुरुवात में भारत में सामंतवाद के सुदृढ़ीकरण को जोड़ने का काम अंग्रेजों ने किया। इसके लिए उन्होंने पहले जागीरदारी और फिर जमींदारी व्यवस्था का सहारा लिया। 

अंग्रेजों ने ये व्यवस्था स्थायी बंदोबस्त के लिए बंगाल और बिहार मि शुरू की थी लेकिन उसके बाद ये सम्पूर्ण भारत में सामंतवाद को गहरा करने का कारण बन गया। जिससे देश में पुरानी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन होने लगा। 

आदिवासीयों के वन क्षेत्र और गैर-आदिवासी किसानों की भूमि को तेजी से ब्रिटिश द्वारा चुने  जमींदारों की क़ानूनी संपत्ति बना दिया गया।  जिससे आदिवासियों के पास जमीन का मालिकाना हक़ नहीं रहा। 

जमीनदारों ने जमीनों पर किये हुए कब्जे और औपनिवेशक सरकार के हस्तक्षेप की वजह से अठारहवीं सदी के अंत और उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में कई आदिवासियोंने विद्रोह किये जिनमे 1767 - 1833 का भूमिज विद्रोह और 1855 -56  के संताल हूल का समावेश है। 

हालाँकि इन विद्रोहोंको ब्रिटिश सरकार ने दबा दिया था। 

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी 

ब्रिटिश साम्राज्य के समय में आदिवासी सुधर और विद्रोह आंदोलन हुए, जिनमें से कुछ ने मिशन पोस्ट पर हमला करके भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी अपना योगदान दिया। 

देखा जाए तो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग देनेवाले काफी आदिवासी वीरों के नाम आते है।  जिनमे बिरसा मुंडा, धरींधर भुआन, लक्ष्मण नाइक, टंट्या भील, बंगारू देवी आदि नामों का समावेश है। 

ब्रिटिश शासन काल के दौरान भारत ने कई पिछड़ी जातियों के विद्रोह देखे जिनमे मुख्य रूप से आदिवासी लोगों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ किये विद्रोह देखा। 

आदिवासी साहित्य 

आदिवासी साहित्य वो है जो भारतीय आदिवासियों के द्वारा रचा गया था। यह साहित्य 100 से भी अधिक भाषाओं में रचित है। आदिवासी साहित्य में आदिवासी भाषाओं और गैर आदिवासी भाषाओं में मौखिक और लिखित साहित्य शामिल है। 

आदिवासी साहित्य की विशेषता इसमें जनजातीय दर्शन की उपस्थिति है। निर्मला पुतुल, वाहरू सोनवणे, ममंग दाई, राम दयाल मुंडा, वंदना टेटे आदि नाम प्रमुख आदिवासी लेखकों में शामिल है। 

आदिवासी धर्म 

आदिवासी समुदाय  ज्यादातर प्रथाएँ हिन्दू धर्म से है। भारत में 1871  से 1941 तक हुई जनगणना में आदिवासियों की गणना अलग धर्मों में की गई है।  जैसे 1891 में वन जनजाति, 1901 में एनिमिस्ट, 1911 में आदिवासी एनिमिस्ट, 1931  में आदिम जनजाति और 1941 में जनजाति के नाम से गणना की गई है। लेकिन 1951 की जनगणना के बाद से आदिवासी आबादी की अलग से की जाने वाली गणना को रोक दिया गया। 

प्रमुख आदिवासी समूह

सम्पूर्ण भारत में आदिवासियों के विस्तार को देखा जाए तो भारत में 700 से भी अधिक आदिवासी समूह रहते हैं जिनमे भील, गोंड, मुंडा, संथाल, बोडो, मीणा, हो, बैगस, असुर, भूमिज आदि कुछ प्रमुख समूह है। 

भारत में बोली जाने वाली आदिवासी भाषाएँ

जनजातीय भाषाओं को अंदमानी, एस्ट्रो - एशियाई, द्रविड़ियन, इंडो-आर्यन और चीनी-तिब्बती ऐसे पांच भाषाई समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है। 

आदिवासी भाषाएँ 

  • बंजारी भाषा
  • भील भाषा
  • भोटिया भाषा
  • बोडो भाषा
  • बोंडा भाषा
  • भूमिज भाषा
  • चौधरी भाषा
  • चेंचू भाषा
  • धोडिया भाषा
  • गामित भाषा
  • गोंडी भाषा
  • गढ़वाली भाषा
  • गुजरी भाषा
  • हल्बी भाषा
  • हो भाषा
  • इरुला भाषा
  • जौनसारी भाषा
  • कार्बी भाषा
  • कोकबोरोक भाषा
  • खासी भाषा
  • भाषा गाना बजानेवालों
  • कुई भाषा
  • कुकी भाषा
  • कुमाऊँनी भाषा
  • कुरुख भाषा
  • अंग्रेजी भाषा
  • मुंडारी भाषा
  • मैतेई भाषा
  • पनिया भाषा
  • संताली भाषा
  • थारू भाषा
  • वर्ली भाषा
  • वे भाषा जानते हैं
  • राथवी भाषा
  • चकमा भाषा
  • कोड भाषा
  • भाषा के लिए
  • थानेदार भाषा
  • बावम भाषा
  • पंक्खु भाषा
  • अराकनी भाषा
  • कोच भाषा
  • बोरी भाषा

भारतीय आदिवासिओं की अर्थव्यवस्था

ज्यादातर जनजातियाँ भारी वनक्षेत्र में रहते हैं जो सिमित राजनितिक या आर्थिक महत्त्व के साथ दुर्गमता को जोड़ती है। अधिकांश जनजातियों का निर्वाह कृषि या फिर शिकार पर निर्भर था। 

आदिवासी समूह  लोहे के अवजार और बर्तन जैसे कुछ जरूरतों के लिए बाहरी लोगों के साथ व्यापर करते थे। 

हालाँकि 20 वी शताब्दी शुरुआत में बेहतर परिवहन और संचार के कारण बड़े क्षेत्र गैर-आदिवासियों के हाथ में आ गए। 1900 के आप पास ब्रिटिश सरकार द्वारा कई क्षेत्रों को एक योजना के माध्यम से खोल दिया गया था। 

जिसके द्वारा आनेवाले प्रवासियों को खेती करने के बदले में भूमि मुफ्त में दी गई थी। हालाँकि जनजातीय लोगों के लिए भूमि को जिसे जरुरत होती थी उसके लिए एक सामान्य और मुफ्त संसाधन के रूप में देखा जाता था। 

जब तक आदिवासियों ने औपचारिक भूमि स्वामित्व प्राप्त करने की आवश्यकता को स्वीकार किया तब तक वे उन भूमियों पर दावा करने का अवसर खो चुके थे जो शायद उनकी मानी जाती थी। 


उम्मीद है आदिवासियों से जुडी ये जानकारी आपके लिए उपयुक्त साबित हो। इस पोस्ट में दी गई सारी जानकारी विकिपीडिया से ली गई है। 

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